काया

अद्भुत,अनुपम,निराली है यौवन की ये काया
नदिया की चंचलता पुष्प की है कोमलता
ये रूप देख दुश्यंत को और कुछ ना भाया

कोमल, कामुक, मदभरा है उसका हर अंग
नयन झुका के हलका सा मुस्करा के
छेड दी दुश्यंत के मन में जलतरंग

बाहुपाश में भर लूं मैं, दुश्यंत का मन हो आया
शारीरिक प्रेम था ये या दो आत्माओं का बंधन
हाय !! ये कविराज कालीदास स्पष्ट ना कर पाया

सोलह बसंत लिये स्वर्णिम, सजल है शकुंतला की काया
इसी नारी देह ने प्रेरित किया है युद्ध भी व प्रेम भी
प्रेरित किया है काम क्रोध मोह और

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